Maharana pratap का इतिहास में वीरता की कहानी के लिए अमर हैं, Maharana Pratap ने सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और वह कई सालों तक संघर्ष करते रहे. महाराणा प्रताप सिंह ने मुगल राजवंश को बहुत बार युद्ध में हराया.

Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap
Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap

Who is maharana pratap or who was maharana pratap

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग जो कि मेवाड़ में पड़ता है वर्तमान में कुंभलगढ़ दुर्ग, राजसमंद जिला राजस्थान भारत में है, महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को हुआ था. इनका पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया है.

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भारत में हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महान वीरयोद्धा महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है। इस तीथि के अनुसार आज 25 मई को महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही है। अपने बहादुरी, वीरता और साहस के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था।

महाराणा प्रताप किस घराने के थे

यह सिसोदिया राजपूत घराने के थे,महाराणा प्रताप की मां महारानी जयवंता बाई थी, यह सनातन धर्म को मानते थे, महाराणा का जन्म वर्तमान राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था. महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के कुंभलगढ में लेखक जेम्स टॉड के अनुसार हुआ था।

महाराणा प्रताप की जन्म कुंडली और कालगणना के राजपूत समाज की परंपरा, इतिहासकार विजय नाहर के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म “पाली के राजमहलों” में हुआ.

महाराणा प्रताप ने लड़ा हल्दीघाटी का युद्ध

हल्दीघाटी युद्ध में भील सरदार राणा पूंजा जी का योगदान सराहनीय रहा। उसने 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 500 भील लोगो को साथ लेकर राणा प्रताप ने आमेर सरदार राजा मानसिंह के 80,000 की सेना का सामना किया. 

Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap

झाला मानसिंह ने जब देखा कि शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप तो आपने अपने प्राण दे कर बचाया और महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र भूमि छोड़ने के लिए बोला. शक्ति सिंह ने आपना घोड़ा देकर महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया को बचाया।

जिसमें प्रिय maharana pratap horse (अश्व) “चेतक” की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17,000 लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये.

महाराणा प्रताप सिंह का हालत दिनोंदिन चिंताजनक होता चला गया। भामाशाह भी 25,000 सैनिकों के 12 साल तक गुजारे लायक अनुदान देकर अमर हुआ. महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया मुगल साम्राज्य काल में अकबर के प्रभुता स्वीकार न करने की जिद पर अड़ा हुआ था.

मेवाड़ एकमात्र राज्य था जो मुगल प्रभुता स्वीकार न करने की जिद पर अड़ा हुआ था. उदयपुर और पहाड़ी क्षेत्रों जो मेवाड़ के वृहत्तर भाग थे. महाराणा प्रताप के नियंत्रण में थे। जैसलमेर और बीकानेर के राजाओं ने अकबर से वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे।

महाराणा प्रताप की बीवियां कितनी थी

महाराणा प्रताप की कुल 11 बीवियां थीं और महाराणा की मृत्यु के बाद सबसे बड़ी रानी महारानी का बेटा अमर सिंह.महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया ने अपने जीवन काल में केवल 11 शादियाँ की थी, महाराणा की पत्नियों और उनसे उत्पन्न पुत्रों तथा पुत्रियों के नाम हैं.

  • 1.महारानी अजबदे ​​पंवार के पुत्र एवं पुत्रियां- अमरसिंह और भगवानदास
  • 2.अमरबाई राठौर के पुत्र एवं पुत्रियां- नत्था
  • 3.शमीति बाई हाडा के पुत्र एवं पुत्रियां- पुराण
  • 4.अलमदेबाई चौहान के पुत्र एवं पुत्रियां- जसवंत सिंह
  • 5.रतनवीर बाई परमार के पुत्र एवं पुत्रियां- माल, यार्ड, क्लिंगु
  • 6.लखाबाई के पुत्र एवं पुत्रियां- रायभाना
  • 7. जसोबाई चौहान – कल्याण दास
  • 8.चंपाबाई जयंती के पुत्र एवं पुत्रियां- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
  • 9.सोलनखिनीपुर बाई के पुत्र एवं पुत्रियां- साशा और गोपाल
  • 10.फूलबाई राठौर के पुत्र एवं पुत्रियां- चंदा और शिखा
  • 11.खीचर आशाबाई के पुत्र एवं पुत्रियां- हत्थी और राम सिंह थे।

1557 ईस्वी में राणा उदय सिंह का पुत्र महाराणा प्रताप गद्दी पर बैठा अकबर ने एक के बाद एक कई दूत मंडल भेज कर महाराणा प्रताप को इस बात पर राजी करने की कोशिश की कि वह मुगल प्रभुता को स्वीकार कर ले अकबर ने उसे जो शाही पोशाक भेजी थी उसे महाराणा प्रताप ने धारण कर लिया था।

महाराणा प्रताप ने बेटे अमर सिंह को अकबर के प्रति व्यक्तिगत रूप से सम्मान व्यक्त करने और उसकी सेवा स्वीकार कर लेने के लिए भगवान दास के साथ दरबार में भेजा था।

राणा प्रताप अकबर का यह आग्रह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि वह व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर संस्था के प्रति सम्मान प्रदर्शित करें।

1576 ईस्वी के आरंभ में अकबर अजमेर पहुंचा और मानसिंह को 5000 की एक सेना लेकर राणा प्रताप पर आक्रमण करने का दायित्व सौंपा।

राणा की तत्कालीन राजधानी कुंभलगढ़ तक जाने वाले रास्ते पर पड़ने वाली तंग घाटी में जोकि हल्दीघाटी के नाम से जानी जाती थी दोनों पक्षों के बीच घमासान युद्ध हुआ।

मुगलों ने डूंगरपुर बांसवाड़ा सिरोही आदि राज्यों में ( जो मेवाड़ के अधीन और उसके मित्र थे और जिन्होंने राणा को समर्थन दिया था) अधिक तबाही मचाई।

अकबर ने इन राज्यों को जीतकर इनके साथ अलग से संधियां कि, जिससे राणा प्रताप और भी अकेला पड़ गया। मुगलों ने कुंभलगढ़ और उदयपुर दोनों पर अधिकार कर लिया। Maharana pratap अकबर के खिलाफ बहुत लड़े और सैन्य बल से कमजोर होने के बाद भी अपना सिर नहीं झुकाया।

जितने Maharana Partap किस्से मशहूर हैं, maharana pratap horse ‘चेतक’ के भी किससे मशहूर हैं. कई किवदंतियां भी सुनाई जाती हैं.कुछ teacher तो राणा प्रताप के बारे में पढ़ाते- पढ़ाते ही भावुक हो जाते थे. राजा महाराणा प्रताप के बारे में बताया जाता था कि दोनों हाथ में भाला लेकर विपक्ष पर टूट पड़ते थे.

महाराणा प्रताप सिंह के हाथों में ऐसा बल था कि दो सैनिकों को एक साथ भाले की नोंक पर टांग देते थे. मेवाड़ में कुछ लोग सुबह उठकर देवता- देवी को नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप सिंह को याद किया करते हैं।

Maharana pratap के बारे में लोगों द्वारा ऐसा कहा जाता रहा है, कि हल्दीघाट में लड़ाई होने के बाद, maharana pratap singh मुगलों पर हमला करते रहे, जिसे गुरिल्ला युद्ध की तकनीक के नाम से जाना जाता है। वह पहाड़ियों और उनके कंदराओं में रहे और वहाँ से बहुत बार मुगल सेनाओं को अपने शिविरों में परेशान किया।

Maharana pratap ने यह सुनिश्चित किया कि मेवाड़ में मुगल सैनिक कभी भी शांति से नहीं रहने देंगे, महाराणा प्रताप को पहाड़ों के ठिकानों से बाहर निकालने के लिए सम्राट अकबर की सेना ने तीन और अभियान चलाए, लेकिन वे सभी साजिश विफल रहा।

महाराणा प्रताप को कब मिली वित्तीय सहायता

maharana pratap singh इस दौरान, भामाशाह नामक एक शुभचिंतक से वित्तीय सहायता मिली। भील आदिवासियों ने जंगलों में रहने के लिए अपनी विशेषज्ञता के साथ maharana प्रताप को अपनी सारी जहां तक हो सके उसने सहायता प्रदान की।

झुलसी हुई धरती का उपयोग कर युद्ध के लिए उनके सारे अभिनव रणनीति, दुश्मन के क्षेत्रों में लोगों की निकास की नीति, कुओं का ज़हर, अरावली में पहाड़ी किलों और गुफाओं का उपयोग मैं कैसे लाना है, लगातार लूटपाट करते रहने से दुश्मन के कैंपों को ध्वस्त करने में मदद मिलती है, जिससे maharana pratap को बहुत राहत मिली।

How maharana pratap died

महाराणा ने मेवाड़ के प्रदेशों को खो दिया। उन्होंने राजस्थान के कई क्षेत्रों को मुग़ल शासन से मुक्त कर दिया। साल बीतते रहे और 1597 में प्रताप की शिकार की दुर्घटना में मृत्यु हो गई। जब उनकी शिकार करने के समय दुर्घटना हुई उसके बाद उन्होंने अपने बड़े बेटे अमर सिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाया।

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महाराणा प्रताप सिंह के कुछ किस्से कहानी के बारे में जाने

महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया के कुछ किस्से के बारे में जानते हैं 1576 ईस्वी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच यह युद्ध हुआ था. अकबर की सेना को मानसिंह अपने नेतृत्व में देख रहे थे. ऐसा बताया जाता है, कि मानसिंह के साथ 10,000 घुड़सवार और हजारों पैदल सैनिक रहा करते थे.

Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap
Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap

लेकिन महाराणा प्रताप 3,000 घुड़सवारों और मुट्ठी भर (बहुत ही कम) दल सैनिकों के साथ लड़ रहे थे. इस दौरान सेनापति मानसिंह की सेना की तरफ से महाराणा पर ऐसा वार किया, जिसे Maharana pratap के वफादार हकीम खान सूर ने अपने ऊपर ले लिया और तब जाकर कहीं उनकी जान बच सका.

महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक की कहानी

महाराणा प्रताप सिंह के कई बहादुर साथी जैसे भामाशाह और झालामान भी इसी युद्ध में महाराणा के प्राण बचाते हुए शहीद हुए थे, दूसरा हवा से बात करता घोड़ा चेतक महाराणा का सबसे प्रिय घोड़ा था. हल्दीघाटी में महाराणा बहुत घायल हो गये थे, उनके पास कोई सहायक नहीं था।

Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap
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ऐसे में महाराणा प्रताप सिंह ने चेतक की लगाम थाम कर निकल गया। Maharana pratap के पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए था, लेकिन महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक की रफ़्तार के सामने दोनों सैनिक थक हार गए. रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था. चेतक बहुत घायल था, लेकिन छलांग मार कर नाला फांद गया और मुग़ल के दोनों सैनिक मुंह तकते रह गए.

लेकिन अब चेतक थक चुका था. वो दौड़ नहीं पा रहा था. महाराणा की जान बचाकर चेतक खुद शहीद हो गया. हल्दीघाटी के बाद महाराणा जब बचकर कुछ दूर पहुंच गए उसी समय महाराणा को किसी ने पीछे से आवाज आई.

जब महाराणा प्रताप अकबर से हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे.

Maharana pratap मुगल साम्राज्य काल के वीर Maharana Pratap
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अकबर ने एक जासूस को महाराणा प्रताप की खोज खबर लेने को भेजा गुप्तचर ने आकर बताया कि महाराणा अपने परिवार और सेवकों के साथ बैठकर जो खाना खा रहे थे उसमें जंगली फल, पत्तियाँ और जड़ें थीं.

जासूस ने बताया न कोई दुखी था, न उदास. ये सुनकर अकबर का हृदय भी पसीज गया और महाराणा के लिए उसके ह्रदय में सम्मान पैदा हो गया. अकबर के विश्वासपात्र सरदार अब्दुर्रहीम खानखान ने भी अकबर के मुख से प्रताप की प्रशंसा सुनी थी।

अकबर के विश्वासपात्र सरदार अब्दुर्रहीम खानखाना ने भारत के वीर पुत्र महाराणा प्रताप के बारे में क्या लिखा

उसने अपनी भाषा में लिखा, इस “संसार में सभी नाशवान हैं. Maharana pratap ने धन और भूमि को छोड़ दिया, पर उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया. हिंदुस्तान के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है.” उनके लोग भूख से बिलखते उनके पास आकर रोने लगते.

मुगल सैनिक इस प्रकार उनके पीछे पड़ गए थे कि भोजन तैयार होने पर कभी-कभी खाने का अवसर भी नहीं मिल पाता था और सुरक्षा के कारण भोजन छोड़कर भागना पड़ता था।

महाराणा प्रताप 12 वर्षों तक कहां जीवन व्यतीत किए

1585 ईस्वी में अकबर ने उत्तर पश्चिम की खतरनाक परिस्थिति पर निगाह रखने के लिए पंजाब में डेरा डाल दिया। अगले 12 वर्षों तक वह वही रहा और राणा प्रताप के खिलाफ कोई मुगल सेना नहीं भेजी गई। राणा प्रताप ने अपने कई प्रदेशों पर फिर से अधिकार कर लिया, जिनमें कुंभलगढ़ और चित्तौड़ के आसपास के क्षेत्र शामिल थे।

इस दौर में राणा प्रताप ने आधुनिक डूंगरपुर के निकट चावंड मैं एक नई राजधानी बसाई। 1597 ईस्वी में मात्र 51 वर्ष की आयु में राणा प्रताप की मृत्यु हो गई।

अकबर की राजपूत नीति मुगल साम्राज्य और राजपूतों दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। राजपूतों से मित्रता के फल स्वरुप मुगल साम्राज्य को भारत के सबसे दुर्घर्ष योद्धाओं की सेवा प्राप्त हुई। साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने और उसका विस्तार करने में राजपूतों की अविचल निष्ठा का महत्वपूर्ण योगदान था।

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