स्वतंत्र भारत का उदय 15 अगस्त को कैसे हुआ आइए जानते हैं इससे जुड़े इतिहास के बारे में 19 फरवरी 1946 को भारत सचिव पैथिक लोरेंस ने घोषणा की कि सरकार शीघ्र ही भारतीय नेताओं के सहयोग से भारत में स्वराज स्थापित करना चाहती है।

ब्रिटिश मंत्रिमंडल कुछ सदस्यों का एक दल जिसे कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है, सत्ता के हस्तांतरण के बारे में भारतीय नेताओं से बातचीत करने के लिए भारत आया। उसने अंतरिम सरकार बनाने और संविधान सभा बुलाने का प्रस्ताव रखा।

15 अगस्त को स्वतंत्र भारत के उदय की दास्तान
15 अगस्त को स्वतंत्र भारत के उदय की दास्तान

प्रस्ताव में कहा गया  की संविधान सभा में प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा प्रतिनिधि और भारतीय रियासतों के शासकों द्वारा मनोनीत व्यक्ति होंगे। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी।

संविधान सभा ने दिसंबर 1946 ईस्वी में अपना काम शुरू कर दिया, परंतु मुस्लिम लीग और राजाओं ने उस में भाग लेने से इनकार कर दिया।

मुस्लिम लीग ने पृथक पाकिस्तान की मांग पर जोर दिया क्यों

1946 ईस्वी में बंगाल, बिहार, मुंबई तथा अन्य स्थानों में दंगे हुए जिनमें हजारों हिंदुओं तथा मुसलमानों की जाने चली गई।

लॉर्ड माउंटबेटन जो कि मार्च 1947 ईस्वी में नए वायसराय बंन कर भारत आए हुए थे भारत को दो  स्वतंत्र राष्ट्र- हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बांटने की योजना प्रस्तुत की। इसे माउंटबेटन योजना कहते हैं।

विभाजन की घोषणा के बाद और भी दंगे हुए, विशेषकर पंजाब में कुछ ही महीनों में करीब 500000 हिंदू और मुसलमान मारे गए। और लाखों लोग बेघर हो गए।

सांप्रदायिक डालो द्वारा फैलाई गई  घृणा  के परिणाम सामने आए ब्रिटिश शासकों ने इन  सांप्रदायिक दलों को प्रोत्साहन दिया था। दंगों के दौरान मानवता को भुला दिया गया और अत्यंत शर्मनाक और इन दिनों नृशंस घटनाएं घटित हुई।

इसको शांत कराने एवं स्वतंत्र भारत का उदय करने के लिए गांधी जी ने अथक प्रयास किए थे। उन्होंने दंगा ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया और शांति स्थापित करने के लिए जी जान से जुट गए।

कांग्रेस शुरू से ही एकीकृत स्वतंत्र भारत के लिए प्रयास करती आ रही थी उन दिनों परंतु अंत में उसने भारत के विभाजन को मान लिया।

कांग्रेस ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया था, परंतु महसूस किया गया कि आजादी प्राप्त करने के लिए और बिगड़ती स्थिति को रोकने के लिए विभाजन को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई और मार्ग शेष नहीं था।

14 अगस्त 1947 ईस्वी को पाकिस्तान एक पृथक राष्ट्र बना 

15 अगस्त को स्वतंत्र भारत के उदय की दास्तान
15 अगस्त को स्वतंत्र भारत के उदय की दास्तान

भारतीय जनता ने करण करीब एक सदी के संघर्ष के बाद विदेशी शासन का समूल नष्ट कर दिया गया। हालांकि यह भयंकर दुखद घटना के बीच हुआ।

स्वतंत्र भारत का उदय होने के बाद जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आधी रात को जब 15 अगस्त का दिन शुरू होने के साथ ही जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में भारत में जीवन और स्वतंत्रता का उदय हुआ।

संविधान सभा स्वतंत्र भारत की संसद के रूप में भी काम करने लगी। 14 अगस्त 1947 को नेहरू ने संविधान सभा में भाषण देते हुए भारतीय जनता के भावी कार्यों और कर्तव्यों के बारे में बतलाए थे।

स्वतंत्र भारत का उदय के बाद अंतरिम मंत्रिमंडल सरकार कुछ इस प्रकार

1. जवाहरलाल नेहरू (सदस्य)- कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष, विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल से संबंधित मामले का विभाग था।

2. सरदार वल्लभभाई पटेल (सदस्य)- इन्हें उन दिनों गृह सूचना एवं प्रसारण विभाग तथा रियासत संबंधी मामले का विभाग मिला था।

3. बलदेव सिंह (सदस्य)- इन्हें स्वतंत्र भारत का उदय के समय रक्षा विभाग मिला था।

4. स्वतंत्र भारत का उदय के बाद ज्वाला नेहरू के प्रधानमंत्री के बनने के बाद सदस्य जॉन मथाई को उद्योग एवं आपूर्ति विभाग मिला।

5. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (सदस्य) इन्हें शिक्षा विभाग मिला था।

6.  सी एच भावा (सदस्य) को कार्य खान तथा बंदरगाह का विभाग मिला था।

7. डॉ राजेंद्र प्रसाद खाद्य एवं कृषि विभाग इन्हें मिला था।

8.आसफ अली को रेल विभाग।

9. जगजीवन राम को श्रम विभाग।

10. एवं लियाकत अली खान को वित्त विभाग मिला।

15 अगस्त स्वतंत्र भारत का उदय के समय यह कार्य थे

गरीबी,अज्ञानता, रोग और अवसर कि असमानता को दूर करना। उन्होंने भारत, भारत की जनता और उससे भी  बढ़कर मानवता की सेवा करने का व्रत लेने को कहा।

उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए एक ऐसा भव्य प्रासाद बनाने को कहा जहां भारत के सभी बच्चे रह सके। 15 अगस्त की सुबह लाल किले पर स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया गया। 15 अगस्त की सुबह भारत के लोग स्वयं अपने भाग्य के निर्माता बन गए। नए भारत के निर्माण का कार्य 15 अगस्त से आरंभ हो गया।

 15 अगस्त को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना

स्वतंत्र भारत को जिस मार्ग पर आगे बढ़ना था, वह आजादी के संघर्ष के दौरान ही निश्चित हुआ था। आजादी की लड़ाई भारतीय जनता को  प्रभुसत्ता-संपन्न बनाने के उद्देश्य से लड़ी गई थी।

यह लड़ाई एक ऐसा जन तंत्र स्थापित करने के लि थी,  जिसमें सारी सत्ता समूची जनता के हाथों में रहनी थी, न कि किसी एक या दूसरे समूह के हाथों में।

भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले, विभिन्न भाषाएं बोलने वाले और विभिन्न रीति-रिवाजों का अनुसरण करने वाले लोग थे। यद्यपि देश में विभेद पैदा करने वाले सांप्रदायिक दलों जैसे तत्व मौजूद थे।

परंतु 15 अगस्त आजादी के आंदोलन को किसी एक या दूसरे समुदाय का आंदोलन बनाने में उन्हें सफलता नहीं मिली। इस प्रकार राष्ट्रीय आंदोलन एक धर्म निरपेक्ष आंदोलन था।

प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार दिया गया। किसी भी धर्म को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया।

धर्मनिरपेक्षता प्रत्येक जनतांत्रिक आंदोलन का अभिन्न अंग होती है। जनतंत्र में सब नागरिक बराबर होते हैं अर्थात सब के समान अधिकार होते हैं।

राष्ट्रीय आंदोलन में एक न्यायोचित समाज की स्थापना के लिए भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का लक्ष्य अपने सामने रखा था। यह लक्ष्य समाजवादी विचारों के प्रसार के साथ अधिक स्पष्ट हो गया था।

इस  लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वतंत्र भारत को समाज में मौजूद असमानता हूं को दूर करने के लिए, तेजी से आर्थिक विकास करने के लिए और आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकने के लिए कड़ा संघर्ष करना था।

राष्ट्रीय आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विषय में एक नीति बनाई थी। यह सभी लोगों की समानता के सिद्धांत पर आधारित थी। इसका अर्थ यह था कि स्वतंत्र भारत उन सभी लोगों को सहयोग देगा जो राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए लड़ रहे हैं।

राष्ट्रीय आंदोलन का दृढ़ विश्वास था कि स्वतंत्रता अविभाज्य है और जब तक हर एक देश स्वतंत्र नहीं होता तब तक किसी भी देश की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं है।

भारत ने शांति की नीति पर जोर दिया क्योंकि शांति से रहने पर ही पुनर्निर्माण का कार्य हो सकता है और विश्व बंधुत्व की भावना का विकास किया जा सकता है।

शांति की नीति इस विश्वास पर भी आधारित थी कि संसार के सभी आम लोगों के हितों में कोई विरोध नहीं है। इस राजा दी और शांति स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का आधार बन गई।

इन सिद्धांतों से प्रेरित होकर भारत की जनता ने 1947 ईसवी में एक स्वतंत्र राष्ट्र की जीवन यात्रा आरंभ की। केवल तीन ही राज्य 15 अगस्त 1947  इसवी तक भारत में नहीं मिले थे जम्मू और कश्मीर, हैदराबाद तथा जूनागढ़।

स्वतंत्रता के तत्काल बाद कश्मीर पर पाकिस्तान ने हमला कर दिया। परंतु जम्मू कश्मीर की जनता अपने को भारत का अंग समझती थी। उसने पाकिस्तानी हमलावरों का डटकर मुकाबला किया।

पाकिस्तानी हमलावरों को मार भगाने के लिए भारतीय सेना वहां भेजी गई जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 में जूनागढ़ की जनता ने भारत में मिल जाने के पक्ष में मत दिया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here