विश्व महासागर दिवस प्रतिवर्ष ‘8 जून’ को मनाया जाता है। वर्ष 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आधिकारिक मान्यता दिये जाने के बाद से यह दिवस मनाया जाता है।

विश्व महासागर दिवस प्रतिवर्ष  8 जून' को
विश्व महासागर दिवस प्रतिवर्ष 8 जून’ को

महासागर के महत्व और उससे संबंधित विषयों खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, पारिस्थितिकि की संतुलन आदि, की ओर राजनीतिक और सामाजिक ध्यान आकर्षित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा महासागर दिवस को मनाने की घोषणा 2009 में की गई।

विश्व महासागर दिवस मनाने का उद्देश्य

विश्व महासागर दिवस मनाने का उद्देश्य का एक प्रमुख कारण महासागरों में आने वाली चुनौतियां और उसकी महत्व को देखते हुए विश्व महासागर दिवस मनाने का फैसला लिया गया।

विश्व महासागर दिवस 8 जून से जुड़े हुए कुछ लेख

विश्व महासागर दिवस 8 जून से जुड़े हुए संबंधित लेख कुछ इस प्रकार हैं – महासागर, जल प्रदूषण पर्यावरण दिवस एवं विश्व जल दिवस यह कुछ इस प्रकार के संबंधित लेख हैं जो कि विश्व महासागर से जुड़े हुए हैं।

विश्व महासागर दिवस 8 जून से जुड़ी कुछ अन्य जानकारी

विश्व महासागर दिवस 8 जून से कुछ अन्य जानकारी इस प्रकार हैं, पहला विश्व महासागर दिवस 8 जून 2009 को मनाया गया था, इसके बाद प्रतिवर्ष 8 जून को विश्व भर में “विश्व महासागर दिवस” मनाया जाने लगा.

यह दिवस सन 1992 में ‘रियो डी जेनेरियो’ में हुऐ ” पृथ्वी ग्रह” नामक फोरम में प्रतिवर्ष विश्व महासागर दिवस मनाने के फैसले के बाद वर्ष 2008 में संयुक्त राज्य राष्ट्र संघ द्वारा इस संबंध में अधिकारिक मान्यता दिए जाने के बाद मनाया जाने लगा.

हमारा पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत भाग महासागरों से घिरा है, महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था, महासागरों में पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त जल का लगभग 97 परसेंट जल समय हुआ है.

महासागर की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि पृथ्वी के सभी महासागरों को एक विशाल महासागर मान लिया जाए तो उसकी तुलना में पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक छोटे द्वीप से प्रतीत होंगे.

मुख्यतः पृथ्वी पर पांच महासागर हैं ,जिनके नाम इस प्रकार हैं-

महासागरों का सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से मौत मानव शरीर में अति महत्वपूर्ण बनाता है इसमें 9 सालों के प्रति जागरूकता के उद्देश्य सन 1992 में प्रतिवर्ष 8 जून को विश्व महासागर दिवस के रूप में मनाया जाना जाता है।

जैव विविधता

अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भंडार होने के साथ महासागर अपने अंदर व आस-पास अनेक छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रो को पनाह देते हैं.

जिससे उन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के जीव व वनस्पतियाँ पनपती हैं। समुद्र में प्रवाल भित्ति क्षेत्र ऐसे ही एक पारितंत्र का उदाहरण है जो असीम जैव विविधता का प्रतीक है।

 इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में स्थित मैन्ग्रोव जैसी वनस्पतियों से संपन्न वन समुद्र के अनेक जीवों के लिए नर्सरी का काम करते हुए विभिन्न जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।

अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। महासागरों में पृथ्वी का सबसे विशालकाय जीव व्हेल से लेकर सूक्ष्म जीव भी मिलते हैं। एक अनुमान के अनुसार केवल महासागर के अंदर करीब दस लाख प्रजातियां उपस्थित हो सकती हैं।

जैव विविधता से संपन्न होने के साथ ही महासागर धरती के मौसम को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक हैं। समुद्री जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है।

यह तो हम जानते ही हैं कि पृथ्वी की समस्त ऊष्मा में जल की ऊष्मा का विशेष महत्त्व है। जितनी ऊष्मा एक ग्राम जल के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि करेगी, उससे एक ग्राम लोहे का तापमान दस डिग्री बढ़ाया जा सकता है।

अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्री जल दिन में सूर्य की ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग अपने में समा लेता है। इस प्रकार अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्र ऊष्मा का भण्डारक बन जाता है, जिसके कारण विश्व भर में मौसम संतुलित बना रहता है या यूं कहें कि जीवन के लिए औसत तापमान बना रहता है।

मौसम के संतुलन में समुद्री जल की लवणता जीवन के लिए एक वरदान है। पृथ्वी पर जलवायु के बदलने की घटना और समुद्री जल का खारापन आपस में अन्तःसंबंधित हैं।

यह तो हम जानते ही हैं कि ठंडा जल, गर्म जल की तुलना में अधिक घनत्व वाला होता है। समुद्र में किसी स्थान पर सूर्य के ताप के कारण जल के वाष्पित होने से उस क्षेत्र के जल के तापमान में परिवर्तन होने के साथ वहां के समुद्री जल की लवणता और आसपास के क्षेत्र की लवणता में अंतर उत्पन्न हो जाता है.

जिसके कारण गर्म जल की धाराएं ठंडे क्षेत्रों की ओर चल देती हैं और ठंडा जल उष्ण और कम उष्ण प्रदेशों में आता है। समुद्र में ये धाराएं केवल इस कारण उत्पन्न होती हैं कि समुद्र का जल खारा है।

क्योंकि यदि सारे समुद्रों का जल मीठा होता तो लवणता का क्रम कभी न बनता और जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएं सक्रिय न होती। परिणामस्वरूप ठंडे प्रदेश बहुत ठंडे रहते और गर्म प्रदेश बहुत गर्म।

तब पृथ्वी पर जीवन के इतने रंग न बिखरे होते क्योंकि पृथ्वी की असीम जैव-विविधता का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां अनेक प्रकार की जलवायु मौजूद है और जलवायु के निर्धारण में महासागरों का महत्त्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता है।

जीवों के पर्यावास पर प्रभाव

वाशिंगटन विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध के प्रमुख कर्टिस ड्यूच के मुताबिक, “यदि आपके मेटाबॉलिज्म बढ़ते हैं तो ऐसी स्थिति में आपको अधिक भोजन और ऑक्सीजन की ज़रूरत है।”

“इसका मतलब यह है कि भविष्य में गर्म पानी की वजह से जल में रहने वाले जीवधारी ऑक्सीजन की कमी से मर जाएंगे। सभी जानते हैं कि समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर घट रहा है और यह जलवायु परिवर्तन के साथ अधिक घटेगा।”

यह शोध चार अटलांटिक महासागर प्रजातियों पर किया गया। अटलांटिक कॉड जो गहरे समुद्र में रहता है, अटलांटिक रॉक क्रैब जो तटीय पानी में रहता है, शार्प स्नाउट सीब्रीम जो उपोष्णकटिबंधीय अटलांटिक और भूमध्य सागर में रहता है और समुद्र तल में रहने वाली मछली ईलपाउट पर किया गया। यह शोध ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

मानवीय गतिविधियों का असर

वर्तमान में मानवीय गतिविधियों का प्रभाव समुद्रों पर भी दिखाई देने लगा है। महासागरों के तटीय क्षेत्रों में दिनों-दिन प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। जहां तटीय क्षेत्र विशेष कर नदियों के मुहानों पर सूर्य के प्रकाश की पर्याप्तता के कारण अधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्रों के रूप में पहचाने जाते थे.

वहीं अब इन क्षेत्रों के समुद्री जल में भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्वों के मिलने से वहाँ जीवन संकट में हैं। तेलवाहक जहाजों से तेल के रिसाव के कारण एवं समुद्री जल के मटमैला होने पर उसमें सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वहाँ जीवन को पनपने में परेशानी होती है

और उन स्थानों पर जैव-विविधता भी प्रभावित होती है। यदि किसी कारणवश पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी आएगी, जिससे वायुमंडल में गैसों की आनुपातिक मात्रा में परिवर्तन होगा.

और तब जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों में असंतुलन होने से पृथ्वी पर जीवन संकट में पड़ सकता है। समुद्रों से तेल व खनिज के अनियंत्रित व अव्यवस्थित खनन एवं अन्य औद्योगिक कार्यों से समुद्री परितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

पर्यावरण सरंक्षण के लिए प्रतिबद्ध संस्था अंतर-सरकारी पैनल की रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों से ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो रही है और जिसके परिणामस्वरूप विश्व भर के मौसम में बदलाव हो सकते हैं।

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