मास्क आदमी का पहचान बना क्योंकि कोरोना काल में मास्क आदमी की सबसे अहम पहचान बन गया है। आप आदमी हैं तो मास्क लगाना होगा। अगर मास्क नहीं है तो आप आदमी से मिट्टी में बदल सकते हैं। इस काल में मास्क आदमी की सबसे अहम पहचान है। आप तो इसे लगाना होगा। अगर नहीं तो आप आदमी से मिट्टी में बदल सकते हैं।

मास्क आदमी का पहचान बना आखिर क्यों
मास्क आदमी का पहचान बना आखिर क्यों

मास्क और आदमी में कोरोना वायरस के बजह से बना मधुर समबन्ध।

आदमी की खुद की हिफाजत के लिए ही जरूरी नहीं है, आदमियत के लिए भी यह अनिवार्य होते जा रहा है। आदमी के पास मास्क नहीं है तो वह दूसरे आदमी के लिए खतरनाक हो सकता है, ऐसे में मास्क आदमी का पहचान बना बैठा है, या यूँ कहें की दोनों के बीच खतरनाक बीमारी में मधुर सम्बन्ध स्थापित हो चूका है ऐसे नहीं करने से पुरे आदमियत को खतरे में डाल सकता है।

मास्क आदमी का पहचान बना 

आपने कोरोना में मास्क लगाया है, तभी आप आदमी हैं। यह ही है, जिससे आप आज आदमी और जानवर का फर्क कर सकते हैं। जानवर भला कहां लगाते हैं? आपने लगाया है, तभी आप जानवर नहीं-आदमी माने जायेंगे। आदमी की श्रेणी में रहने के लिए शिष्टता, अनुशासन जरूरी है यानी मास्क जरूरी है।

मास्क आदमी का पहचान बना

कोरोना वायरस में मास्क नहीं है तो आप अशिष्ट हैं, उच्छृंखल हैं, गैर जिम्मेदार हैं लोकडौन नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। बगैर मास्क के निकले हैं तो पुलिस कहीं भी पकड़ लेगी। पूछेगा कि आदमी हो कि पाजामा ? क्यों नहीं लगाया ? आपको पता नहीं है की यह आदमी का पहचान बना हुआ है ? पुलिस वाला भी आखिर आदमी ही है।

बगैर इसके देखकर उसे गुस्सा भी आ सकता है और वह बगैर पूछे आपके पृष्ठ भाग की सिंकाई भी कर सकता है। सिंकाई भी ऐसी कि जब-जब दर्द उभरेगा तब स्मरण हो आयेगा कि यार क्यों भूल गया था?

इसलिए घर के बाहर पांव रखने के पहले आदमी के बच्चे भी ताकीद करते हैं ऐ पापा, ऐ अंकल, ओ आंटी मास्क पहनकर जाओ, मास्क आदमी का पहचान है। ऐसे भी आप अपने जेहन की खिड़की थोडा खोलेंगे तो पायेंगे कि नब्बे फीसद आदमी बिना इसके आदमी होते ही नहीं हैं।

अपने आस-पड़ोस, घर-रिश्तेदार, बाजार-दफ्तर कहीं भी ऐसा आदमी बमुश्किल दिखेगा जिसने अपने असल चेहरे पर नहीं चढ़ा रखा है, मुखौटा नहीं पहन रखा है। इसीलिए निदा फाजली साहब ने आदमी की पहचान के लिए यह शेर ही लिख डाला। हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।

इसके पहले साहिर लुधियानवी साहब का लिखा ‘सच’ लता मंगेशकर दीदी ने सुरीले स्वर में हमें बता दी थीं। जब भी जी चाहे नयी दुनिया बसा लेते हैं लोग एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग !

चेहरे पर चेहरा लगाना, मतलब मुखौटा लगाना, एक आदमी के चेहरे पर चढ़े हुए चेहरे यानी मास्क की पहचान आदमी के लिए कभी आसान नहीं रही है। फिर भी, कोरोना काल में आदमी के चेहरे पर जो चढ़ा है, उसने आदमियों की कई प्रजातियों की परिभाषा नये सिरे से गढ़ दी है।

जिन्होंने एन-95 जैसे लगा रखे हैं, वो सबसे ज्यादा जागरूक ही नहीं, सक्षम और समर्थ भी हैं। घर की सिलाई मशीन या धागों से टांककर बने पहननेवाले, गमछे को इस्तेमाल करनेवाले, दसटकिया पहननेवाले इन सब के आधार पर आदमी की सोच, हैसियत, उसकी जागरूकता आदि का मोटे तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है।

पेड़ों के पत्ते का बना कर पहननेवाले जंगलवर्ती गांवों में रहनेवाले आदिवासियों को देखकर प्रकृति के प्रति उनके समर्पण, देशज आविष्कारों की उनकी सहज परिकल्पना से आप आह्लादित हो सकते हैं, चमत्कृत हो सकते हैं।

इसका इस्तेमाल-गैर इस्तेमाल के तरीकों से भी आदमी के कई ‘प्रकार’ की पहचान हो सकती है। कुछ लोग इसको गले या कान में लटकाकर यह मान लेते हैं कि कोरोना इसे देखकर ही रफूचक्कर हो जायेगा। कुछ लोग सिर्फ पुलिस की पिटाई से बचने के लिए लेकर निकलते हैं। पुलिस दिखी तो मास्क लगा लिया। पुलिस की नजरों से ओझल होते ही उसे ताबीज की तरह लटका लिया।

कुछ लोग, खास तौर पर मेकअप की बदौलत ढलते हुए यौवन को रोकने का यत्न करनेवाली प्रौढ़ाएं भारी चिंता में हैं कि हमेशा के लिए अनिवार्य हो गया तो उनका क्या होगा ! सड़कों किनारे सब्जी बेचनेवाले ज्यादातर लोग लगाना पसंद नहीं करते, जैसे उन्होंने यह मान रखा हो कि वे अमृत पान कर घर से निकले हैं, उन्हें कोरोना-फोरोना छू भी नहीं सकता।

इसकी अपनी सीमाएं हैं। वह कोरोना को तो रोक सकता है, लेकिन वह ‘सब कुछ’ नहीं रोक सकता। आदमी के दिल में दूसरे आदमी के लिए नफरत का जो गुबार है, उसे कोई मास्क नहीं रोक सकता। नफरत के वायरस के आगे यह पूरी तरह बेअसर है। इससे हर चेहरे को छिपाया नहीं जा सकता।

अपने घर- अपने गांव जाने को सड़कों पर निकले बेबस मजदूरों को ‘बीमारी’ समझकर नाक-भौं सिकोड़नेवालों के चेहरे भी चढ़े होने के बावजूद आसानी से पहचाने-पढ़े जा सकते हैं। आखिरी बात। 2020 में तकरीबन पूरे साल इसके साथ पहचान बना कर गुजारने की आदत डाल लेनी होगी। यह है तो सांस है। नहीं तो जिंदगी भी नहीं है। मास्क है तो आदमी है। 

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