हम कुछ लोगों को बता रहे थे कि पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें,हमारे योग केंद्र में एक योगिक अस्पताल सा बना है कुछ डॉक्टर इसे देखना चाहते थे और वे हमारे यहां आए। वे एक हफ्ते यहां थे और एक हफ्ते के बाद वे मुझसे बहुत नाराज़ थे। मैंने कहा – “क्यों, मैंने क्या किया? वे चारों तरफ यही बातें कर रहे थे – “ये सब फ़ालतू बकवास है! सद्गुरु ने कहा यहां एक योगिक अस्पताल! कहां है योगिक अस्पताल? हमें कोई बिस्तर नहीं दिख रहे हैं, हमें कुछ नहीं दिख रहा”।

पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें
पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें

समस्या क्या है पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें कैसे मुझे समझ आया कि उनकी समस्या क्या है,कैसे पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें फिर मैंने उन्हें बुलाया और मैंने कहा – “परेशानी क्या है” उनमें से एक महिला, जिनकी आँखों में आंसू थे, बोलीं – मैं यहां इतने विश्वास के साथ आई और यहां धोखा हो रहा है, यहां कोई अस्पताल नहीं है, बिल्कुल भी कुछ नहीं यहां और आप बोल रहे हैं कि यहां अस्पताल है।

मैं ने कहा आराम से बैठिये आपके द्वारा रचित काल्पनिक अस्पताल के बारे में ये विचार हैं कि बहुत से बिस्तर हों जहां मरीजों को सुला दो और उन्हें दवाइयां देते रहो – ये अस्पताल ऐसा नहीं है।

मैं आपको आस-पास घुमाता हूँ . सभी मरीज़ यहां बगीचे में काम कर रहे हैं, और रसोई घर में काम कर रहे हैं। हम उनसे काम करवाते हैं, और वे ठीक हो जाते हैं।

पंच तत्वों से जुड़कर जीवन सबसे महत्वपूर्ण चीज है

सबसे महत्वपूर्ण चीज़ ये है कि अगर कोई बीमार हो तो हम उनसे बगीचे में काम करवाते हैं। उन्हें खाली हाथों धरती के संपर्क में कम से कम आधे घंटे से लेकर 45 मिनट तक जरुर होना होता है।

ऐसा करने से वे पंच तत्वों से जुड़कर जीवन स्वस्थ हो जाते हैं। क्योकि आप जिस चीज़ को शरीर कहते हैं वो बस इस धरती का एक टुकडा है, है न? हां या ना? वे सभी अनगिनत लोग जो इस धरती पर चले, वे सब कहां गए? सब धरती की उपरी सतह पर हैं, है न? ये शरीर भी धरती की सतह पर चला जाएगा – जब तक कि आपके दोस्त – इस डर से कि आप फिर से न जाग जाएं – आपको बहुत गहरा न दफना दें।

शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार होना

यह बस धरती का एक टुकड़ा है। तो यह अपने सर्वोत्तम रूप में तब रहेगा, जब आप धरती से थोडा संपर्क बनाकर रखें। फिलहाल आप हर वक़्त सूट और बूट पहन कर पचासवें फ्लोर पर चलते रहते हैं, और कभी भी धरती के संपर्क में नहीं आते। ऐसे में आपका शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार होना स्वाभाविक है।

फिर मैंने उन्हें दिखाया – “देखो इस व्यक्ति को दिल का रोग है, उस व्यक्ति को वो बीमारी है। मैंने सभी मरीजों से उनका परिचय कराया और फिर मरीज़ अपनी बातें बताने लगे उन्होंने कहा कि“तीन हफ्ते पहले हम ऐसे थे. अब हमें बहुत अच्छा लग रहा है, हम अपनी बीमारी ही भूल गए हैं।”

Medical (मेडिकल) मापद पंच तत्वों से जुड़कर जीवन कैसे जीयें

अब सभी मेडिकल मापदंड भी कह रहे हैं कि वे ठीक हैं। अमेरिकी डॉक्टर को यह विश्वास दिलाने में कि ये लोग सच में मरीज़ हैं हमें बहुत मेहनत करनी पड़ी। हम उन्हें अच्छे काम में भी लगा रहे हैं।पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीये इन पंचमहाभूतों का हमारे मनीषियों ने इस प्रकार विश्लेषण किया है

पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें
पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें

पृथ्वी तत्व से पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीने के उपाय

पृथ्वी तत्त्व का स्थान पंच तत्वों में है शक्तिकेंद्र (मूलाधार चक्र ) | अस्थि , मांस , त्वचा , रोम और रक्तवाहिनियां — इन पाँचों का पृथ्वी तत्त्व से सम्बन्ध है. कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से दबाने पर शरीर में पृथ्वी तत्त्व का संतुलन होता है |

पृथ्वी तत्व में असीम सहनशीलता का द्योतक है और पंच तत्वों से जुड़कर जीवन मनुष्य धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। इसके त्रुटिपूर्ण होने से लोग स्वार्थी हो जाते हैं।

पृथ्वी तत्व से यकृत , आमाशय और प्लीहा पर इस तत्त्व का नियंत्रण है | इसकी अधिकता से कफ , श्वास में भारीपन, आलस्य, उल्टी, पैर में कृमि और चक्षु रोग आदि होते हैं | यह तत्त्व यदि पूर्ण रूप से संतुलित हो तो व्रण , चमड़ी , हड्डी — सब ठीक हो जाते हैं.

From 21December to 20 March, the element of earth remains dominant in the body.

जल तत्व से पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीने के उपाय

पंच तत्वों से जुड़कर जीवन में जल तत्व शीतलता प्रदान करता है। इसमें विकार आने से सौम्यता कम हो जाती है। पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीना आसान हो जाता है.गर्मी में जब धरती तपने लगती है तब हमें जल का महत्त्व समझ में आने लगता है।

आयुर्वेद की भाषा में इसे समझें तो जल श्रम की थकान दूर करने वाला, बेहोशी और प्यास मिटाने वाला, खेद नाशक, बेवक्त आने वाली नींद को मिटाने वाला, आलस्य को भगाने वाला, तृप्तिकारक, हृदय का मित्र, शीतल हल्का और अमृत के समान जीवन का सबसे बड़ा सहायक तत्व है।

सुबह से लेकर रात तक हमें जल की जरूरत पड़ती है। सफाई से लेकर खाने-पीने, नहाने-धोने तक में पानी की जरूरत पड़ती है। भोजन के बिना तो आप कई दिन गुजार सकते हैं पर पानी के बिना ज्यादा समय सकुशल गुजारना मुश्किल है।

हवा के बाद जीवन के लिए सबसे आवश्यक पानी ही है। यह गुण पानी में ही है कि उसे तरल के अलावा ठोस और गैस में भी परिवर्तित किया जा सकता है। जल में चीजों को साफ करने का प्रबल गुण है।

दुनिया का कोई भी फ्रेशनर पंच तत्वों से जुड़कर जीवन ऐसी ताज़गी नहीं दे सकता, जैसी जल में स्नान करने से मिलती है। एक दिन न नहाएं तो पूरे दिन आप अलसाए रहते हैं। यह जल ही तो है जिसके स्पर्श का एहसास आनंद देता है। स्विमिंग कर लें तो शरीर नई चेतना महसूस करने लगता है। जल तत्व का स्नान करना हमारे धर्मो में भी पुण्यकारी माना गया है।

अग्नि तत्व से पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीने के उपाय

पंच तत्वों में यह अग्नि तत्व विचार शक्ति में सहायक बनता है और मस्तिष्क के भेद अंतर को परखने वाली शक्ति को सरल बनाता है। यदि इसमें त्रुटि आ जाए तो हमारी सोचने की शक्ति का ह्रास होने लगता है। अग्नि तत्त्व कुंडलिनी ऊर्जा की अग्नि है। कुंडलिनी योग के अभ्यास से इसे बढ़ाया जाता है।

भोजन के पाचन और अवशोषण में सहायता करता है ताकि पूरे शरीर को जीवित रहने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जा सके। अग्नि तत्त्व हमारे कर्म, हमारे ब्लॉक और हमारे डर को जला देता है। यह हमें प्रतिबद्धता, अनुशासन, इच्छा-शक्ति और हमारे इरादों को पूरा करने की क्षमता प्रदान करता है।

यह शारीरिक और भावनात्मक रूप से दोनों को पचाने, अवशोषित करने और आत्मसात करने की शक्ति है। पंच तत्वों से जुड़कर जीवन में इस तत्व के उचित उपयोग के माध्यम से, हम उन अनुभवों को पूरी तरह से पचाना सीखते हैं जो हमें जीवन से प्राप्त होते हैं।

क्रोध की आग भड़काना

“आप सभी अपने गुस्से से छुटकारा चाहते हैं,” योगी कहेंगे। “अपने गुस्से से छुटकारा पाएं और आप अपने भोजन को पचाने में सक्षम नहीं होंगे।”

वायु तत्व- से पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीने के उपाय

यह वायु तत्व मानसिक शक्ति तथा स्मरण शक्ति की क्षमता व पोषण प्रदान करता है। अगर इसमें विकार आने लगे तो स्मरण शक्ति कम होने लगती है। योगिक परंपरा में, हम हवा को “वायु” के रूप में संदर्भित करते हैं.

जिसका अर्थ न केवल नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों के मिश्रण के रूप में हवा है, बल्कि आंदोलन के आयाम के रूप में है। पांच मूल तत्वों में से – पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और ईथर – जो हमें और ब्रह्मांड में सब कुछ बनाते हैं.

वायु तत्व सबसे सुलभ और अपेक्षाकृत आसान है जिससे उचित महारत हासिल की जा सकती है। इसलिए, बड़ी संख्या में योगाभ्यास वायु या वायु के चारों ओर संरचित हैं, हालांकि शरीर की संरचना में, वायु केवल एक छोटा प्रतिशत बनाती है।

नाभि और गले के गड्ढे के बीच का क्षेत्र प्राण का मुख्य गतिविधि क्षेत्र है। सांस लेने के एक तत्व को शामिल करने वाले अधिकांश योगाभ्यासों का उद्देश्य वायु या प्राण वायु के प्रति है। वायु तत्व है – प्राण वायु पंच प्राणों में से एक है।

हम प्राण के गर्भ में हैं, जो वायुमंडलीय बुलबुला है। यह बड़ा प्राण अट्ठाईस प्राणों में बिखर जाता है। वायु तत्व की मानें तो पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीने के लियेआपको ऊर्जा की एक असीम मात्रा प्रतीत होगी।

असीम ऊर्जा जैसी कोई चीज नहीं है, हालांकि – केवल अन्य लोगों की धारणा में, ऐसा प्रतीत होता है। यदि आपका प्राण वायु तत्व वास्तव में सक्रिय है, तो आप अपना समय अच्छी तरह से प्रबंधित कर पाएंगे।

जीवन समय और ऊर्जा का एक संयोजन है। यदि आप अपनी ऊर्जा या प्राण वायु को बहुत तीव्र रखते हैं, तो आपको अधिक समय लगेगा। पंच तत्वों से जुड़कर जीवन में गतिविधि आपकी ऊर्जा के प्रवाह से बाहर होगी, प्रयास से बाहर नहीं। इसीलिए पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें.

आकाश तत्व द्वारा कैसे पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें

पंच तत्वों से जुड़कर जीवन में आकाश तत्व शरीर में आवश्यक संतुलन बनाए रखता है। इसमें विकार आने से हम शारीरिक संतुलन खोने लगता है। भारतीय दर्शन के पांच तत्व गांव-गांव तक चर्चित है। रामचरित मानस की क्षिति जल पावक गगन समीरा वाली चौपाई हिन्दी भाषी क्षेत्रों में गंवई गंवार भी गाते हैं।

तुलसीदास ने पांच तत्वों वाली बात कोई अपनी तरफ से ही नहीं कही थी। लेकिन यही पांच तत्व समूचे भारतीय साहित्य में भी मौजूद हैं। महाभारत में धर्म व्याध द्वारा एक ब्राह्मण को सृष्टि रहस्य समझाने की सरल कथा है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पांच तत्व हैं।

इस सूची में पूर्व वाले तत्व बाद वाले तत्वों के गुणों से युक्त हैं। आकाश यहां सबसे बाद में हैं। आकाश का गुण शब्द है। इसके पहले वायु है। वायु में आकाश का गुण शब्द है, अपना गुण स्पर्श है। वायु में दो गुण हैं। इसके पहले अग्नि हैं। अग्नि में पहले के दो गुण शब्द व स्पर्श हैं। उसका अपना गुण रूप भी है।

अग्नि में तीन गुण हैं। अग्नि के पहले जल है। जल में ऊपर के तीनों गुण शब्द, स्पर्श, रूप तो हैं ही उसका अपना गुण रस है। जल में चार गुण हैं। सूची में बची पृथ्वी में पहले के चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप रस के साथ ही अपना गुण गंध भी है। पृथ्वी में पांच गुण हैं। विकास की गति सूक्ष्म से स्थूल की दिशा में चलती है।

प्रथम तत्व आकाश है। उसके पास एक गुण है। आकाश का विकास वायु है, दो गुणों से युक्त हैं, वायु का विकास अग्नि तीन गुण वाला है। अग्नि का विकास जल है। यह चार गुणों वाला है। सबसे बाद में विकसित पृथ्वी में 5 गुण हैं। आकाश प्रथम है। संसार पंच महाभूतों पंच तत्वों से जुड़कर जीवन का ही प्रपंच है।

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि रचना के पहले की स्थिति का वर्णन है न सत् था, न असत्, अंधकार ही अंधकार था। तब क्या था? यहां अंधकार आकाश की प्रथम अवस्था हो सकती है। स्वामी विवेकानंद ने ऋग्वेद के हवाले से आकाश को आदि तत्व माना और ‘राजयोग’ में लिखा आकाश ही वायु बनता है, द्रव व ठोस बनता है, आकाश से ही सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र, नक्षत्र, धूमकेतु बनता है.

आकाश ही प्राणियों वनस्पतियों का शरीर बनाता है। उसका प्रत्यक्ष बोध नहीं होता। बिलकुल ठीक लिखा है। ऋग्वेद की ऋचाएं भी परम व्योम में रहती हैं। देवता भी वही रहते हैं। आकाश का गुण शब्द है, मंत्र ऋचाएं अक्षर-शब्दों की ही काया धारण कर नीचे उतरती है।

सविता और ऊषा ऋग्वैदिक ऋषियों के निराले देव हैं, वे आकाश से झांकते हैं। मरुत, वरुण, मित्र इन्द्र आदि देवता आकाश में ही दीपित हैं। सारी दुनिया विश्व प्रपंचों के लिए ‘ऊपर’ की ओर देखती है। परम सत्ता का एक नाम ‘ऊपर वाला’ है। लोग अकसर कहते हैं कि ऊपर वाले की कृपा से यह काम हुआ और ऊपर वाले ने यह काम बिगाड़ दिया। ऊपर वाला ‘आकाश’ ही मूल तत्व है।

भावविभोर ऋषि आकाश को पिता कहते हैं और पृथ्वी को माता। ऋषि कहते हैं, पहले दोनों मिले हुए थे। तब उनका नाम ‘रोदसी’ था। एक मंत्र के अनुसार धरती आकाश को अलग करने का काम मरुतों ने किया। काव्य सर्जन के भीतर झांकने पर सृष्टि विकास की परतें आसानी से खुलती हैं।

वैज्ञानिक गाड पार्टीकिल – पंच तत्वों से जुड़कर जीवन के ईश्वरीय तत्व की खोज में है। सृष्टि रचना का मूल आधार कोई आदि तत्व या आदि द्रव्य ही होना चाहिए। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हिन्दू चिन्तन के पांच तत्व हैं। यूनान और यूरोप के दर्शन में चार तत्व ही थे। वे आकाश को रिक्त स्थान या शून्य मानते थे।

परवर्ती यूनानी चिन्तक अनक्सिमेंडर ने सृष्टि रचना के मूल तत्व को अनिश्चित – इनडिफनेट (ता-अपईरान) बताया था। अरस्तू ने उनके ‘अनिश्चित तत्व’ को ‘देशगत असीम’ कहा था। अनक्सिमेडर के ‘अनिश्चित तत्व’ के गुण ज्ञात नहीं थे। उनके अनुसार वह मूल चार तत्वों पृथ्वी, अग्नि और वायु से भिन्न है। वह कोई और है, उसी से आकाश उत्पन्न हुआ है।

अरस्तू की टिप्पणी है कि अनक्सिमेंडर का असीम – या अनिश्चित सब चीजों को घेरे हुए हैं, सबका मूल संचालक भी है। कह सकते हैं कि अनक्सिमेंडर का असीम उपनिषदों वाला ब्रह्म जैसा है। उपनिषदों का ब्रह्म सबको आवृत करता है। पंच तत्वों से जुड़कर जीवन सबके भीतर भी है, सबका संचालक भी है। लेकिन अनक्सिमेंडर का अनिश्चित और कोई अज्ञात तत्व नहीं है। उनका अनिश्चित भारतीय चिन्तन का ‘आकाश’ तत्व ही है। पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें. ऐसा नहीं करने से अनेको लाभ से वंचित रह सकते हैं।

चरक संहित के अनुसार पांच तत्वों के समायोजन से स्वाद भी बनते हैं- मीठा-पृथ्वी+जल, खारा- पृथ्वी+अग्नि, खट्टा- जल+अग्नि, तीखा-वायु+अग्नि, कसैला-वायु+जल, कड़वा-वायु+आकाश। पंच तत्वों के बिना नहीं कर सकते जीवन की कल्पना पंच तत्वों से जुड़कर जीवन जीयें।

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